सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामले में बुधवार को केंद्र सरकार की एक अर्जी खारिज कर दी। दरअसल, केंद्र सरकार ने जघन्य अपराधों के मामलों में पीड़ित और समाज-केंद्रित दिशानिर्देश निर्धारित करने की मांग की थी। केंद्र सरकार का कहना था कि अदालत को अब पीड़ित और समाज के हितों को ध्यान में रखना चाहिए और ऐसे दिशानिर्देश तय करने चाहिए जो अभियुक्तों के लिए पहले से तय दिशानिर्देशों को आगे बढ़ाएं।
यह मामला न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा हमें इस विविध आवेदन में कोई दम नहीं दिखता।
केंद्र सरकार ने अदालत मे दी ये दलील
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि मौत की सजा पाए दोषी के लिए उपलब्ध कानूनी और संवैधानिक उपायों का लाभ उठाने की कोई समय-सीमा नहीं है। अदालत को अब पीड़ित और समाज के हितों को ध्यान में रखना चाहिए और ऐसे दिशानिर्देश तय करने चाहिए जो अभियुक्तों के लिए पहले से तय दिशानिर्देशों को आगे बढ़ाएं। उसने अर्जी दायर कर कहा था कि जघन्य अपराध के दोषी “न्यायिक प्रक्रिया को धोखा” दे रहे हैं।
केंद्र ने 2012 के निर्भया सामूहिक दुष्कर्म-हत्या मामले में चार दोषियों को फांसी देने में हो रही देरी के बीच, ब्लैक वारंट जारी होने के बाद दोषियों को फांसी देने के लिए सात दिन की समय-सीमा तय करने का शीर्ष अदालत से आग्रह किया था।
शीर्ष अदालत ने जनवरी 2020 में स्पष्ट कर दिया था कि शत्रुघ्न चौहान मामले से जुड़े दोषसिद्धि और सजा के मुद्दे को केंद्र की याचिका पर विचार करते समय नहीं बदला जाएगा। केंद्र ने तर्क दिया था कि मृत्युदंड ऐसे मामलों में दिया जाता है जो अदालत की सामूहिक अंतरात्मा को झकझोर देते हैं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि 2014 का मामला अंतिम रूप ले चुका है क्योंकि समीक्षा और उपचारात्मक याचिकाएं, दोनों पहले ही खारिज हो चुकी हैं।

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