जालंधर/ उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े एक अहम फैसले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने बीमा कंपनी द्वारा दांतों के इम्प्लांट के मेडिकल क्लेम को खारिज करने को गलत ठहराते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने माना कि दांतों का इम्प्लांट केवल कॉस्मेटिक प्रक्रिया नहीं बल्कि कई मामलों में जरूरी सर्जिकल उपचार होता है, इसलिए इसे तकनीकी आधार पर खारिज करना उचित नहीं।
मामले के अनुसार जालंधर निवासी सूरत चंदर (67), जो ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (अब पंजाब नेशनल बैंक में विलय) से सेवानिवृत्त हैं, बैंक की ग्रुप हेल्थ पॉलिसी के तहत बीमित थे। वर्ष 2023 में उन्हें जबड़े में तेज दर्द और सूजन की समस्या हुई, जिसके चलते उन्हें तत्काल दंत उपचार कराना पड़ा। डॉक्टरों की सलाह पर दो दांत निकालने के बाद इम्प्लांट कराया गया, जिस पर लगभग 53 हजार रुपये खर्च हुए।
इसमें से 10 हजार रुपये अन्य बीमा पॉलिसी से मिल गए, जबकि शेष 43 हजार रुपये का क्लेम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी से किया गया। लेकिन बीमा कंपनी ने पॉलिसी की एक शर्त (डेंटल ट्रीटमेंट बिना अस्पताल में भर्ती) का हवाला देते हुए क्लेम खारिज कर दिया।
आयोग की अहम टिप्पणियां
उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में कहा कि:
– दांतों का इम्प्लांट केवल सौंदर्य संबंधी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कई मामलों में जरूरी सर्जिकल उपचार होता है।
– बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों को अत्यधिक तकनीकी तरीके से लागू कर असली मेडिकल क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं।
– यदि उपचार आपात स्थिति में जरूरी हो, तो केवल अस्पताल में भर्ती न होने के आधार पर क्लेम नकारना उचित नहीं।
– बीमा कंपनियों को दावों के निपटारे में निष्पक्षता और सद्भावना से काम करना चाहिए।
आयोग ने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को तेज दर्द और सूजन के कारण तत्काल उपचार की जरूरत थी और इम्प्लांट उपचार मेडिकल आवश्यकता के तहत किया गया था, न कि कॉस्मेटिक उद्देश्य से।
बीमा कंपनी को भुगतान का आदेश
आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि:
– 43,000 रुपये का क्लेम 6% वार्षिक ब्याज सहित अदा किया जाए (शिकायत दाखिल होने की तारीख से भुगतान तक)।
– मानसिक तनाव और उत्पीड़न के लिए 20,000 रुपये अतिरिक्त मुआवजा दिया जाए।
– आदेश की प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश
इस फैसले को उपभोक्ता अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बीमा कंपनियां केवल तकनीकी कारणों से वास्तविक मेडिकल जरूरत वाले दावों को खारिज नहीं कर सकतीं। इससे खासकर दंत चिकित्सा और अन्य गैर-परंपरागत उपचारों से जुड़े बीमा दावों के मामलों में मिसाल स्थापित होने की संभावना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय बीमा कंपनियों को अधिक पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से दावों का निपटारा करने के लिए प्रेरित करेगा, वहीं उपभोक्ताओं को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करेगा।

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