Buland kesari/पंजाब कांग्रेस में अंदरूनी कलह के बीच हाईकमान ने पूर्व सीएम एवं सांसद चरणजीत चन्नी को फटकार लगाई है। उन्हें पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने तलब किया और उन्हें अपने समर्थकों को नियंत्रण में रहने को कहा है। वेणुगोपाल ने कार्यक्रमों में हो रही नारेबाजी और पोस्टरबाजी पर सवाल खड़े किए।
जानकारी के अनुसार वेणुगोपाल ने चन्नी को कहा कि 15 दिन में पार्टी सख्त फैसला लेगी। उसके बाद एक फाइनल फॉर्मूला तैयार किया जाएगा। इसके बाद जिस नेता को जो करना है वो करने को स्वतंत्र है। उधर, राजा वड़िंग गुट को भी पार्टी हाईकमान तलब कर सकता है।
पिछले कुछ दिनों से वड़िंग की अगुआई वाले कार्यक्रमों में चन्नी के समर्थन में नारे लग रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी उन्हें तरजीह नहीं दी जा रही।
आखिर ऐसी क्या वजह है कि 2021 में पंजाब का पहला दलित मुख्यमंत्री बनाने के लिए अपनी पीठ थपथपाने वाला कांग्रेस हाईकमान अब चन्नी को तरजीह नहीं दे रहा। इसके पीछे 2022 का चुनाव नतीजा, पार्टी का इंटरनल फीडबैक और जट्टसिख नेताओं की अगुआई में कामयाबी समेत 6 बड़ी वजहें सामने आई हैं।

पढ़िए, वह 6 वजहें, जिनसे चन्नी इग्नोर
1. पहला दलित मुख्यमंत्री बनाने का दांव फेल हुआ
2021 में जट्टसिख नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को CM कुर्सी से हटाया। दूसरे जट्टसिख नेताओं नवजोत सिद्धू या सुखजिंदर रंधावा के बजाय कांग्रेस ने दलित वोट बैंक को साधने के लिए चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। पंजाब में करीब 31-32% दलित आबादी है, जो देश में सबसे अधिक मानी जाती है।
मगर, 2022 विधानसभा चुनाव में इसका अपेक्षित फायदा नहीं मिला। राज्य की 34 अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित सीटों में कांग्रेस सिर्फ 5 सीटें जीत सकी, जबकि आम आदमी पार्टी ने 28 सीटों पर कब्जा जमाया। पार्टी के भीतर इसे दलित कार्ड के सीमित असर के तौर पर देखा गया।
2. मुख्यमंत्री-CM फेस रहते दोनों सीटों से हारे
कांग्रेस ने चन्नी के दलित फेस का फायदा उठाने के लिए उन्हें चमकौर साहिब और भदौड़, दोनों रिजर्व सीटों से उम्मीदवार बनाया था। चमकौर साहिब उनकी पारंपरिक सीट थी, लेकिन वहां से वह 7,942 वोटों से हार गए।। वहीं, भदौड़ में आम आदमी पार्टी के लाभ सिंह उगोके ने उन्हें 37,558 वोटों के भारी अंतर से हराया। तत्कालीन सीएम और CM चेहरा होने के बावजूद दोनों जगहों से हारने के बाद कांग्रेस समझ गई कि चन्नी इतने बड़े ट्रंप कार्ड भी नहीं हैं कि उसके लिए जट्टसिख नेताओं से प्रतिनिधित्व छीना जाए।
3. कांग्रेस का पुराना फॉर्मूला: जट्ट सिख नेतृत्व में 10 बार सरकार
पंजाब की राजनीति का इतिहास रहा है कि कांग्रेस ने जब भी राज्य में सरकार बनाई है, जट्ट सिख चेहरे को आगे रखकर ही सफलता हासिल की है। राज्य में भले ही दलित आबादी का आंकड़ा बड़ा हो, लेकिन राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक संतुलन के मामले में जट्ट सिख समुदाय हमेशा निर्णायक भूमिका में रहता है। हाईकमान को यह समझ आ गया है कि आगामी चुनावों में वापसी के लिए पार्टी को फिर से पारंपरिक जट्ट सिख चेहरे पर ही दांव लगाना होगा।
4. कैप्टन जैसा अड़ियल रवैया दिखा रहे
विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने चन्नी को चुनाव प्रचार समिति (कैंपेन कमेटी) का चेयरमैन बनाया था। सूत्रों के मुताबिक, चन्नी इस जिम्मेदारी से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने संगठन के कुछ फैसलों पर सार्वजनिक नाराजगी भी जताई। हालांकि, पार्टी के भीतर यह संदेश गया कि हाईकमान ने उनके विरोध के बावजूद अपनी रणनीति में कोई बदलाव नहीं किया। 2017 में सीएम बने कैप्टन अमरिंदर सिंह की वर्किंग भी इसी तरह की थी कि वह सेल्फ स्टाइल फैसले लेते थे। सीएम कुर्सी से हटाने की भी यही मेन वजह थी। अब चन्नी भी यही कोशिश कर रहे, जो कांग्रेस हाईकमान को नागवार गुजरी है।
5. इंटरनल फीडबैक- दलित वोट बैंक पर असर नहीं
हाईकमान से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने कुछ आरक्षित सीटों पर संगठनात्मक फीडबैक और चुनावी आकलन कराया था। इसमें यह समझने की कोशिश की गई कि अगर भविष्य में चन्नी पार्टी का प्रमुख चेहरा नहीं होते हैं तो उसका चुनावी असर कितना होगा।
सूत्रों का दावा है कि आकलन में यह बात सामने आई कि पंजाब का दलित वोट बैंक किसी एक नेता के पीछे पूरी तरह एकजुट नहीं होता। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और धार्मिक डेरों का प्रभाव अधिक रहता है। इसी आधार पर पार्टी के भीतर यह आकलन बना कि चन्नी की भूमिका सीमित होने से दलित वोट बैंक में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
6. चन्नी के साथ जुटे ज्यादातर नेता टिकट के इच्छुक
इंटरनल सर्वे के दौरान चन्नी का सपोर्ट कर रहे नेताओं की भी लिस्टिंग की गई। इन्हें देखकर पता चला कि इनमें से करीब 80% नेता ऐसे हैं, जो 2027 के चुनाव में टिकट के इच्छुक हैं। चन्नी के जरिए वह टिकट पक्की करना चाहते हैं। इसके अलावा बाकी ज्यादातर नेता ऐसे हैं, जो अपने रिश्तेदारों को टिकट दिलाना चाहते हैं।
इनमें बूथ लेवल से लेकर जिला स्तर तक के कोई नेता या वर्कर चन्नी के सपोर्ट में नहीं दिखे। दूसरी तरफ प्रधान राजा वड़िंग कह चुके हैं कि इस बार नए चेहरों को टिकट मिलेगी। उन्होंने बठिंडा में यहां तक कह दिया कि जिला परिषद मेंबरों व ब्लॉक प्रधानों को चुनाव लड़ाऊंगा। उन्हें टिकटें दूंगा।

चन्नी के खिलाफ पोस्टर वार भी शुरू
कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चन्नी के खिलाफ अब पंजाब के अलग-अलग शहरों में पोस्टर वार शुरू कर दी है। अमृतसर में भी चन्नी के खिलाफ पोस्टर लगे हैं। पोस्टरों में चन्नी को कांग्रेस से निकालने की अपील की गई है। इसके अलावा चन्नी के भाजपा में जाने वाले पोस्टर भी लगाए गए हैं।

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