इजराइल की सियासत में अरब पार्टियों का उभार, 19 सीटों के साथ बनीं संभावित किंगमेकर! नेतन्याहू और विपक्ष के सामने सत्ता का बड़ा सवाल
Buland Kesari/ तेल अवीव; इजराइल की राजनीति में 27 अक्टूबर को हुए आम चुनाव के बाद एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण राजनीतिक तस्वीर उभरकर सामने आई है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन और विपक्षी खेमे के बीच कड़ी टक्कर के बीच अरब नेतृत्व वाली पार्टियां सरकार गठन के समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में पहुंच गई हैं। शुरुआती मतगणना के दौरान दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे बहुमत के आंकड़े से दूर दिखाई दिए, जबकि अरब पार्टियों ने ऐतिहासिक बढ़त दर्ज की।
85.6 प्रतिशत मतों की गिनती के दौरान अरब पार्टियों को 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया। वहीं नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 सीटें और विपक्षी गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे को 48 सीटें मिलने का अनुमान था। इजराइल की 120 सदस्यीय संसद, नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन आवश्यक है। ये आंकड़े शुरुआती मतगणना पर आधारित हैं और इन्हें अंतिम चुनाव परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।
अरब पार्टियों की बढ़ती ताकत ने बदले राजनीतिक समीकरण
इजराइल में अरब नागरिक देश की आबादी का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा हैं। लंबे समय से अरब समुदाय से जुड़ी पार्टियां संसद में प्रतिनिधित्व करती रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय सरकार के गठन में उनकी भूमिका अक्सर सीमित रही है।
इस बार अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के संभावित रूप से 19 सीटों तक पहुंचने से राजनीतिक परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। यदि दोनों प्रमुख खेमों में से कोई भी 61 सीटों का बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो अरब पार्टियों का समर्थन सरकार बनाने, विश्वास मत जीतने या संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में अहम साबित हो सकता है।
हालांकि, सीटों की संख्या बढ़ना और सरकार में प्रत्यक्ष भागीदारी मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी पार्टी का किंगमेकर बनना इस बात पर निर्भर करता है कि वह अन्य दलों के साथ समझौता कर पाती है या नहीं।
नेतन्याहू के लिए क्यों बढ़ी चुनौती?
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला गठबंधन शुरुआती आंकड़ों में बहुमत से आठ सीटें पीछे दिखाई दिया। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे को भी अपने दम पर सरकार बनाने के लिए आवश्यक समर्थन नहीं मिलता दिखा।
इस स्थिति में नेतन्याहू के सामने अपने मौजूदा सहयोगियों को एकजुट रखने के साथ-साथ अन्य राजनीतिक विकल्पों पर विचार करने की चुनौती है। अरब पार्टियों के समर्थन के बिना सरकार बनाने की कोशिश करने वाले किसी भी खेमे को संसद में बहुमत जुटाने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़ सकते हैं।
नेतन्याहू और उनके कुछ सहयोगियों ने अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ गठबंधन बनाने का विरोध किया है। इससे राजनीतिक गणित और राजनीतिक इच्छाशक्ति के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है।
विपक्ष के सामने भी आसान नहीं है रास्ता
गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे के लिए भी स्थिति सरल नहीं है। शुरुआती आंकड़ों में उसे 48 सीटें मिलने का अनुमान था, जो बहुमत के लिए पर्याप्त नहीं है।
अरब पार्टियों के साथ समर्थन या सहयोग का समझौता विपक्ष को बहुमत के करीब पहुंचा सकता है। लेकिन इस विकल्प के सामने वैचारिक मतभेद और गठबंधन सहयोगियों की आपत्तियां बड़ी बाधा बन सकती हैं।
इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों के साथ औपचारिक गठबंधन को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी नेता चुनावी गणित को प्राथमिकता देते हैं या अपने मौजूदा राजनीतिक रुख पर कायम रहते हैं।
कौन हैं अरब पार्टियां और क्या चाहती हैं?
इजराइल की अरब राजनीति में कई अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियां सक्रिय हैं। इनमें प्रमुख हैं:
-
- राअम (Ra’am): मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली पार्टी, जो अरब नागरिकों के लिए स्थानीय विकास, आवास, बुनियादी ढांचे और सामाजिक मुद्दों पर व्यावहारिक राजनीतिक समझौतों को महत्व देती है।
-
- जॉइंट लिस्ट (Joint List): अरब नेतृत्व वाला राजनीतिक गठबंधन, जो अरब नागरिकों के अधिकारों और फिलिस्तीनी मुद्दों को प्रमुखता देता है। इसके घटकों की राजनीतिक विचारधाराओं में भी अंतर है।
इन पार्टियों के बीच रणनीति को लेकर मतभेद हो सकते हैं। कुछ नेता सरकार में शामिल होकर नीतिगत बदलाव लाने के पक्षधर रहे हैं, जबकि अन्य सरकार को बाहर से समर्थन देने या विपक्ष में रहकर अपनी मांगें उठाने को अधिक उपयुक्त मानते हैं।
2021 में भी अरब पार्टी ने निभाई थी अहम भूमिका
अरब पार्टियों की मौजूदा भूमिका को समझने के लिए 2021 का राजनीतिक घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। उस समय मंसूर अब्बास की राअम पार्टी नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनी थी। यह इजराइल में किसी स्वतंत्र अरब पार्टी की सरकार में भागीदारी का ऐतिहासिक उदाहरण था।
राअम ने अरब समुदाय के लिए बजट, आवास, बुनियादी सुविधाओं और अपराध पर नियंत्रण जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। हालांकि, वह गठबंधन 2022 में टूट गया।
इस अनुभव ने दिखाया कि अरब पार्टियां केवल विरोध की राजनीति तक सीमित रहने के बजाय सरकार गठन की प्रक्रिया में भी भाग ले सकती हैं। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि गठबंधन में भागीदारी अपने आप स्थायी राजनीतिक प्रभाव की गारंटी नहीं देती।
मुस्लिम आबादी और अरब राजनीतिक प्रतिनिधित्व में क्या अंतर है?
इस पूरे घटनाक्रम को केवल धार्मिक प्रभाव के रूप में देखना सही नहीं होगा। इजराइल की अरब आबादी में अधिकांश लोग मुस्लिम हैं, लेकिन अरब समुदाय में ईसाई और अन्य धार्मिक समुदाय भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, सभी अरब नागरिक एक ही पार्टी को वोट नहीं देते और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हो सकती हैं।
इसलिए अरब पार्टियों की चुनावी सफलता को मुस्लिम समुदाय के पूरे देश की सत्ता पर नियंत्रण के रूप में पेश करने के बजाय इसे संसदीय प्रतिनिधित्व, मतदाताओं की भागीदारी और गठबंधन राजनीति के संदर्भ में समझना अधिक सटीक है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में इजराइल की राजनीति मुख्य रूप से तीन संभावित रास्तों पर आगे बढ़ सकती है:
-
- समझौते से नई सरकार: कोई प्रमुख राजनीतिक खेमा छोटे दलों और संभावित सहयोगियों के साथ मिलकर 61 सीटों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर सकता है।
-
- अरब पार्टियों का बाहर से समर्थन: अरब पार्टियां मंत्रिमंडल में शामिल हुए बिना विश्वास मत या कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर समर्थन देने के बदले नीतिगत रियायतें मांग सकती हैं।
-
- लंबा राजनीतिक गतिरोध: यदि प्रमुख दल सहयोग पर सहमत नहीं होते, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है और नए चुनाव की संभावना भी पैदा हो सकती है।
इजराइल के 2026 के चुनाव ने अरब नागरिकों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनकी पार्टियों की भूमिका को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। शुरुआती मतगणना में 19 सीटों का अनुमान इन पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन उनकी वास्तविक ताकत इस बात से तय होगी कि वे अपने संसदीय समर्थन को कितने प्रभावी राजनीतिक समझौतों और नीतिगत परिणामों में बदल पाती हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इजराइल के प्रमुख राजनीतिक दल अरब पार्टियों के साथ सहयोग करने को तैयार होंगे, या वैचारिक मतभेद सरकार गठन की राह में बाधा बने रहेंगे? इसी सवाल का जवाब आने वाले दिनों में देश की सत्ता के समीकरण तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
नोट: यह रिपोर्ट 28 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध शुरुआती चुनावी आंकड़ों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। अंतिम आधिकारिक परिणाम और गठबंधन की स्थिति बदल सकती है।

Disclaimer:Buland Kesari receives the above news from social media. We do not officially confirm any news. If anyone has an objection to any news or wants to put his side in any news, then he can contact us on +91-98880-00404.







