Buland Kesari :स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग) ने रियल एस्टेट क्षेत्र में धोखाधड़ी और देरी के खिलाफ एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने M/s WTC Noida Development Company Pvt. Ltd. और GMADA (ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी) से जुड़े एक मामले में दो शिकायतकर्ताओं के पक्ष में फैसला देते हुए पूरी जमा राशि ब्याज और मुआवजे के साथ वापस करने का आदेश दिया है।
यह आदेश दर्ज केस नंबर 81 of 2025 (रविंदर पाल सिंह वालिया बनाम WTC नोएडा) और केस नंबर 82 of 2025 (गुरजीत सिंह बनाम WTC नोएडा) की साझा सुनवाई के बाद 8 जून 2026 को सुनाया गया।
मामले से जुड़े मुख्य पक्ष (Names of Parties)
1. शिकायतकर्ता (Complainants)
केस 1 (Complaint No. 81 of 2025): रविंदर पाल सिंह वालिया (Ravinder Pal Singh Walia) और उनकी पत्नी परमिंदर कौर वालिया (Parminder Kaur Walia), निवासी सेक्टर 36-B, चंडीगढ़।
केस 2 (Complaint No. 82 of 2025): गुरजीत सिंह (Gurjit Singh) और गुरनूर सिंह (Gurnoor Singh), निवासी फेज-3B2, SAS नगर, मोहाली।
2. विरोधी पक्ष (Opposite Parties)
WTC Noida Development Company Pvt. Ltd. (मैनेजिंग डायरेक्टर/अधिकृत प्रतिनिधियों के माध्यम से – दिल्ली और मोहाली दफ्तर)।
आशिष भल्ला (Ashish Bhalla): मैनेजिंग डायरेक्टर, WTC नोएडा।
शेरिफ मुइन खान (Sherif Muin Khan): डायरेक्टर, WTC नोएडा।
सचिन कुमार हुई (Sachin Kumar Hui): डायरेक्टर (केस 82 में शामिल)।
कमलेश कुमार (Kamlesh Kumar): डायरेक्टर (केस 82 में शामिल)।
ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (GMADA): पुडा भवन, मोहाली (सरकारी संस्था जिसे बाद में मामले में जोड़ा गया)।
क्या था पूरा मामला?
शिकायतकर्ताओं ने साल 2019 में मोहाली के ‘WTC Chandigarh Aerocity’ प्रोजेक्ट में व्यावसायिक दुकानें/ऑफिस स्पेस बुक किए थे।
वालिया परिवार ने 1630 वर्ग फुट की दुकान के लिए तय राशि ₹1,67,17,291 में से ₹1,46,39,250 का भुगतान कर दिया था। बिल्डर-बायर्स एग्रीमेंट के तहत उन्हें 31 दिसंबर 2022 तक इस संपत्ति का कब्जा (Possession) मिल जाना चाहिए था।
धोखाधड़ी का खुलासा:
जब खरीदार मोहाली स्थित साइट पर जाते, तो वहां कोई काम नहीं चल रहा होता था। बिल्डर उन्हें लगातार झूठे आश्वासन देता रहा। बाद में खरीदारों को पता चला कि बिल्डर ने जरूरी मंजूरियां (Approvals) और रेरा (RERA) नियमों का पालन नहीं किया था। हद तो तब हो गई जब ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया कि बिल्डर ने प्रोजेक्ट का लगभग ₹77 करोड़ रुपया दूसरी जगहों पर डाइवर्ट (Siphoning of funds) कर दिया था।
इसके अलावा, बिल्डर द्वारा किश्तों का भुगतान न करने के कारण GMADA ने इस पूरे प्रोजेक्ट की जमीन का अलॉटमेंट (आवंटन) ही रद्द कर दिया था।
विरोधियों की दलीलें और कोर्ट द्वारा उन्हें खारिज किया जाना:
बिल्डर (WTC) का तर्क: बिल्डर ने चालाकी दिखाते हुए कहा कि चूंकि यह एक कमर्शियल प्रॉपर्टी है, इसलिए खरीदार ‘उपभोक्ता’ (Consumer) की श्रेणी में नहीं आते। साथ ही उन्होंने मामला रेरा (RERA) के पास लंबित होने की बात कही।
कोर्ट का फैसला:
कोर्ट ने बिल्डर के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि खरीदारों ने अपनी आजीविका (Self-employment) के लिए यह निवेश किया था, इसलिए वे पूरी तरह उपभोक्ता हैं। वहीं GMADA को लेकर कोर्ट ने कहा कि एक सरकारी रेगुलेटरी अथॉरिटी होने के नाते वे अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते, क्योंकि उन्होंने खरीदारों के पैसों से बनी इमारत को अपने कब्जे में ले लिया है।
अदालत का अंतिम आदेश (The Final Verdict):
उपभोक्ता अदालत ने बिल्डर की हरकतों को सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in service) और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) माना। अदालत ने निम्नलिखित आदेश दिए हैं।
पूरी रकम की वापसी:
विरोधी पक्षों को आदेश दिया गया है कि वे शिकायतकर्ताओं (जैसे वालिया परिवार की ₹1,46,39,250 की रकम) को उनकी पूरी जमा राशि वापस करें।
9% सालाना ब्याज: यह रिफंड राशि उस तारीख से जोड़ी जाएगी जब पैसे जमा किए गए थे और जब तक भुगतान नहीं हो जाता, तब तक इस पर 9% सालाना की दर से ब्याज देना होगा।
इसी प्रकार दूसरे शिकायतकर्ताओं को भी उसकी पूरी राशि 84,93,507 रुपए ब्याज़ सहित लौटाने होंगे।
मानसिक प्रताड़ना का मुआवजा: खरीदारों को जो मानसिक परेशानी और वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा, उसके लिए भी अलग से मुआवजा और अदालती खर्च (Litigation expenses) देने का आदेश दिया गया है।
यह फैसला उन सभी बिल्डरों के लिए एक कड़ा सबक है जो आम जनता की गाढ़ी कमाई लेकर प्रोजेक्ट्स को अटकाते हैं और नियमों का उल्लंघन करते हैं।

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