Buland Kesari// *चंडीगढ़:*
स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (SCDRC), चंडीगढ़ ने एक व्यापारिक प्रतिष्ठान के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए चोला एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी (Chola MS General Insurance Company Ltd.) को तगड़ा झटका दिया है।
आयोग ने जिला उपभोक्ता फोरम के पुराने आदेश को पलटते हुए बीमा कंपनी को आदेश दिया है कि वह शिकायतकर्ता को ₹1,93,79,529 (करीब 1.93 करोड़ रुपये) का बकाया क्लेम 9% सालाना ब्याज के साथ चुकाए। इसके अलावा इंश्योरेंस कंपनी को ₹35,000 मुकदमा खर्च (Litigation Cost) भी देना होगा।
यह फैसला आयोग की पीठ, जिसमें प्रिसाइडिंग मेंबर पद्मा पांडेय और मेंबर राजेश के. आर्य शामिल थे, द्वारा 16 जून 2026 को सुनाया गया।
### *क्या है पूरा मामला?*
मामला चंडीगढ़ के सेक्टर-26 स्थित एक दुकान *’मेसर्स बिट्टू फैशनेर्स 26′ (M/s Bittu Fashioners 26)* से जुड़ा है। दुकान के मालिक ने चोला एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी से ₹6 करोड़ का टोटल सम इंश्योर्ड (जिसमें ₹5 करोड़ का स्टॉक और ₹1 करोड़ का फर्नीचर-फिक्सचर शामिल था) लेकर एक ‘चोला एमएस भारत लघु उद्यम सुरक्षा पॉलिसी’ ली थी।
27 फरवरी 2023 को, दुकान के साथ लगते बेसमेंट में शॉर्ट सर्किट होने के कारण भयंकर आग लग गई। यह आग तेजी से फैली और शिकायतकर्ता की दुकान (SCO नंबर 9) को अपनी चपेट में ले लिया। आग बुझाने के दौरान भारी मात्रा में पानी और धुएं के कारण बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर पर रखा करोड़ों रुपये का कपड़ा और अन्य सामान पूरी तरह बर्बाद हो गया।
### *इंश्योरेंस कंपनी का अड़ंगा और पुराना विवाद*
घटना के बाद इंश्योरेंस कंपनी ने एक सर्वेक्षक (M/s Puri Crawford) नियुक्त किया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि सर्वेक्षक ने यह कहते हुए बेसमेंट में हुए नुकसान के दावे को खारिज कर दिया कि पॉलिसी शेड्यूल में ‘बेसमेंट’ शब्द का अलग से कोई जिक्र नहीं है, इसलिए बेसमेंट का स्टॉक इंश्योरेंस के दायरे में नहीं आता। कानूनी नोटिस भेजने के बाद, कंपनी ने केवल ₹27,78,000 (करीब 27.78 लाख रुपये) का बेहद कम क्लेम असेस किया, जिसे शिकायतकर्ता ने विरोध जताते हुए (Under Protest) स्वीकार कर लिया।
इसके बाद जब पीड़ित कारोबारी ने जिला उपभोक्ता फोरम (District Commission) का दरवाजा खटखटाया, तो फोरम ने भी तकनीकी आधार पर शिकायत को खारिज कर दिया था। इस फैसले को कारोबारी ने चंडीगढ़ स्टेट कमिशन में चुनौती दी।
### *स्टेट कमिशन (आयोग) ने क्या तर्क दिए?*
अपील की सुनवाई करते हुए स्टेट कमिशन ने इंश्योरेंस कंपनी के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। आयोग ने दस्तावेज़ों को गहराई से देखने के बाद निम्नलिखित अहम बातें कहीं:
1. *’इमारत’ की परिभाषा में बेसमेंट शामिल:*
पॉलिसी के नियमों व शर्तों (Schedule Annexure) के मुताबिक, “Building” (भवन) की परिभाषा में स्पष्ट रूप से लिखा है कि इसमें “Basement (if any)” यानी बेसमेंट भी शामिल है। जब पॉलिसी खुद मानती है कि बिल्डिंग में बेसमेंट शामिल है, तो इंश्योरेंस कंपनी यह बहाना नहीं बना सकती कि बेसमेंट का जिक्र शेड्यूल में अलग से नहीं था।
2. *पुरानी पॉलिसी से हटाया गया था क्लॉज:*
आयोग ने नोट किया कि पिछली इंश्योरेंस पॉलिसी में कंपनी ने “No basement exposure” (यानी बेसमेंट का कवर नहीं) का क्लॉज जानबूझकर डाला था। लेकिन इस नई पॉलिसी में उस क्लॉज को हटा दिया गया था। इंश्योरेंस कानून का नियम है कि अगर किसी पाबंदी (Exclusion) को स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है, तो उसे उपभोक्ता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
3. *स्वतंत्र सर्वेक्षक की रिपोर्ट को माना सही:*
शिकायतकर्ता ने एक स्वतंत्र और लाइसेंस प्राप्त सर्वेक्षक (M/s Allied Assurance Consultancy Pvt. Ltd.) से नुकसान का वैज्ञानिक मूल्यांकन करवाया था, जिसने कुल नुकसान का आकलन ₹2,21,57,529 किया था। आयोग ने पाया कि इस स्वतंत्र सर्वेक्षक ने बैंक के स्टॉक स्टेटमेंट और व्यापारिक खातों की पूरी जांच कर पारदर्शी तरीके से यह रिपोर्ट तैयार की थी।
### *अंतिम फैसला और हर्जाना*
आयोग ने स्वतंत्र सर्वेक्षक द्वारा आकलित कुल ₹2,21,57,529 के नुकसान में से इंश्योरेंस कंपनी द्वारा पहले दिए जा चुके ₹27,78,000 को घटाकर बची हुई राशि *₹1,93,79,529* को शिकायतकर्ता का वास्तविक हक माना।
*आयोग ने निम्नलिखित कड़े निर्देश जारी किए:*
* *₹1,93,79,529 का भुगतान:* विपक्षी इंश्योरेंस कंपनी को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 45 दिनों के भीतर इस राशि का भुगतान करना होगा।
* *9% से 12% ब्याज:*
इस राशि पर आग लगने/दावे की तारीख से भुगतान के समय तक *9% सालाना साधारण ब्याज* देना होगा। यदि कंपनी 45 दिनों के भीतर भुगतान करने में विफल रहती है, तो डिफॉल्ट अवधि के लिए ब्याज दर बढ़कर *12% सालाना* हो जाएगी।
* *मुकदमा खर्च:*
कंपनी शिकायतकर्ता को ₹35,000 मुकदमा खर्च के रूप में अलग से देगी।
* *अन्य को राहत:*
सर्वेक्षक (M/s Puri Crawford) और बैंक ऑफ बड़ौदा के खिलाफ शिकायतों को खारिज कर दिया गया क्योंकि उनकी भूमिका क्लेम रोकने में सीधे तौर पर गलत नहीं पाई गई।
यह फैसला उन सभी पॉलिसीधारकों के लिए एक बड़ी नजीर है, जिन्हें इंश्योरेंस कंपनियां बारीक अक्षरों में लिखे तकनीकी नियमों (Terms & Conditions) का हवाला देकर क्लेम देने से मना कर देती हैं।

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