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न्यू चंडीगढ़ में फ्लैट का पज़ेशन लटकाने पर अंबिका रियलकॉन बिल्डर को कड़ी फटकार, राज्य उपभोक्ता आयोग ने लगाया भारी जुर्माना

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National News

भारत के इस राज्य के CM और डिप्टी CM पर चलीं गोलियां!

Buland Kesari/ जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित...

​* 9% ब्याज़ के साथ देना होगा पज़ेशन में देरी का मुआवज़ा और अदालती खर्च

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​Buland Kesari: न्यू चंडीगढ़ में फ्लैट बुक कराकर बरसों तक पज़ेशन का इंतज़ार करने वाले होमबायर्स के पक्ष में राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (स्टेट कंज्यूमर कमीशन), चंडीगढ़ ने एक बड़ा और अहम फैसला सुनाया है । आयोग की अतिरिक्त बेंच ने मशहूर बिल्डर कंपनी मैसर्स अंबिका रियलकॉन डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s Ambika Realcon Developers Private Limited) को सेवा में गंभीर कोताही और लापरवाही का दोषी करार दिया है।

​आयोग की पीठासीन सदस्य श्रीमती पद्मा पांडे और सदस्य श्री राजेश के. आर्य की बेंच ने मामले (शिकायत संख्या: 96/2025) की सुनवाई करते हुए बिल्डर कंपनी को आदेश दिया है कि वह पीड़ितों को फ्लैट सौंपने में हुई देरी के एवज में उनकी जमा राशि पर 9 फीसदी सालाना दर से ब्याज़ (मुआवज़ा) अदा करे। इसके साथ ही पीड़ित परिवार को हुई मानसिक परेशानी के लिए ₹75,000 और मुकदमा खर्च के तौर पर ₹35,000 अलग से चुकाने का हुक्म दिया है।

​₹1.49 करोड़ का फ्लैट, 31 मार्च 2023 तक मिलना था कब्ज़ा:

​मामले की जानकारी देते हुए शिकायतकर्ताओं के वकील श्री निर्मल सिंह कंधौला ने आयोग को बताया कि चंडीगढ़ के सेक्टर 36A के रहने वाले सुखविंदर सिंह कंग और उनकी पत्नी इंदरजीत कौर कंग ने अप्रैल 2022 में बिल्डर के प्रोजेक्ट में एक फ्लैट बुक किया था।

‘VERSAILLES’ टावर-5 की 15वीं मंजिल पर स्थित इस फ्लैट (नंबर 1503) की कुल कीमत जीएसटी समेत ₹1,49,84,660 तय की गई थी, जिसके एवज में खरीदारों ने समय-समय पर करीब ₹1.41 करोड़ से अधिक का भुगतान कंपनी को कर दिया था।

​बिल्डर और बायर्स के बीच हुए एग्रीमेंट के मुताबिक, कंपनी को हर हाल में 31 मार्च 2023 तक फ्लैट का कब्ज़ा शिकायतकर्ताओं को सौंपना था।

​1 साल 8 महीने की देरी, किराए के मकान में रहने को मजबूर हुए खरीदार:

​पीडितों का पक्ष रखते हुए एडवर्टाइज़र ने दलील दी कि तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी बिल्डर ने उन्हें फ्लैट नहीं दिया।

समय पर घर न मिलने के कारण शिकायतकर्ताओं को भारी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ा और वे किराए के मकान में रहने को मजबूर हुए, जिससे उन पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।

आखिरकार, 1 साल, 8 महीने और 18 दिन की लंबी देरी के बाद बिल्डर ने 18 दिसंबर 2024 को पज़ेशन सर्टिफिकेट जारी किया।

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​बिल्डर की तकनीकी दलीलें आयोग ने कीं खारिज

​दूसरी ओर, बिल्डर कंपनी और उनके अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता राकेश कुमार की तरफ से पेश वकील श्री मनप्रीत सिंह लोंगिया ने शिकायत का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि यह शिकायत उपभोक्ता कानून की दो साल की तय समय सीमा के बाद दायर की गई है, इसलिए इसे खारिज किया जाए।

कंपनी ने यह भी कहा कि उन्हें अथॉरिटी से ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) सितंबर 2024 में मिला, जिसके बाद उन्होंने कब्ज़ा ऑफर कर दिया था।

​आयोग ने सुबूतों को देखते हुए बिल्डर के तर्कों को पूरी तरह नकार दिया। आयोग ने सख्त लहजे में कहा कि जब तक बिल्डर के पास वैध ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट नहीं आ जाता, तब तक वह खरीदार को कब्ज़ा लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता और पज़ेशन की यह देरी उपभोक्ता के प्रति ‘लगातार होने वाला अन्याय’ (Continuing Cause of Action) है।

​उपभोक्ता अदालत का अंतिम फरमान:

30 दिन में देना होगा पैसा
​आयोग ने सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) के फैसलों का हवाला देते हुए साफ किया कि होमबायर्स अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई बिल्डर के पास इस भरोसे के साथ निवेश करते हैं कि उन्हें समय पर आशियाना मिलेगा।

आयोग के आदेश पत्र के तहत मुख्य रूप से विपक्षी पार्टी नंबर 1 (मैसर्स अंबिका रियलकॉन) को निर्देश दिए हैं:

​9% वार्षिक ब्याज़:

खरीदारों द्वारा जमा कराई गई पूरी राशि पर 01.04.2023 से लेकर 18.12.2024 (कब्ज़ा मिलने की तारीख) तक की पूरी अवधि के लिए 9% सालाना दर से देरी का मुआवज़ा ब्याज सहित दिया जाए।
​₹75,000 मानसिक प्रताड़ना हर्जाना: बायर्स को मानसिक तौर पर परेशान करने और सेवा में कमी
रखने के एवज में ₹75,000 की मुश्त राशि दी जाए।

​₹35,000 अदालती खर्च:

शिकायतकर्ताओं को उनकी कानूनी लड़ाई के खर्च के लिए ₹35,000 का भुगतान किया जाए।
​बिल्डर को चेतावनी:

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आयोग ने आदेश की कॉपी मिलने के 30 दिनों के भीतर इस पूरी रकम का भुगतान करने को कहा है। यदि कंपनी तय समय में नाकाम रहती है, तो ब्याज की दर 9% से बढ़कर 12% सालाना दंडात्मक ब्याज (Penal Interest) में तब्दील हो जाएगी। वहीं, कंपनी के डायरेक्टर/साइनिट्री राकेश कुमार (विपक्षी नंबर 2) के खिलाफ शिकायत को खारिज कर दिया गया क्योंकि वे कंपनी की हैसियत से काम कर रहे थे।

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