जालंधर उपभोक्ता आयोग का फैसला, कहा- केवल ‘इंटरमीडियरी’ होने का दावा कर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती ई-कॉमर्स कंपनी
Buland Kesari: जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जालंधर ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ई-कॉमर्स कंपनी Amazon Retail India प्राइवेट लिमिटेड को उपभोक्ता को 2,590 रुपये की राशि वापस करने तथा 10,000 रुपये मुआवजा एवं मुकदमा खर्च देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि कंपनी खरीदे गए उत्पाद की वास्तविक डिलीवरी साबित करने में विफल रही और उपभोक्ता की शिकायत का संतोषजनक समाधान भी नहीं कर सकी, जो सेवा में कमी (Deficiency in Service) और अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) की श्रेणी में आता है।
यह फैसला जिला उपभोक्ता आयोग, जालंधर की अध्यक्ष डॉ. हरवीन भारद्वाज तथा सदस्यों जसवंत सिंह ढिल्लों और ज्योत्सना की पीठ ने 10 जुलाई 2026 को सुनाया।
क्या था मामला
शिकायतकर्ता विपिन सिंगला ने 6 फरवरी 2024 को अमेजन प्लेटफॉर्म के माध्यम से “ARK: Survival Evolved – PlayStation 4” गेम ऑर्डर किया था। इस उत्पाद की कीमत 2,590 रुपये थी, जिसका भुगतान ऑनलाइन माध्यम से किया गया।
शिकायतकर्ता के अनुसार अमेजन की वेबसाइट पर 17 फरवरी 2024 को ऑर्डर को “डिलीवर” दिखा दिया गया, जबकि उसे या उसके परिवार के किसी सदस्य को यह उत्पाद कभी प्राप्त नहीं हुआ।
उपभोक्ता ने कंपनी से कई बार संपर्क कर या तो उत्पाद की डिलीवरी का प्रमाण देने या फिर राशि वापस करने की मांग की, लेकिन उसकी शिकायत स्वीकार नहीं की गई।
डिलीवरी टाइमिंग पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने आयोग के समक्ष ट्रैकिंग रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार पार्सल दोपहर 2:14 बजे डिलीवरी स्टेशन पहुंचा, 2:15 बजे ‘आउट फॉर डिलीवरी’ दिखाया गया और मात्र 2:21 बजे ‘डिलीवर’ दर्शा दिया गया।
शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि अंतिम डिलीवरी स्टेशन और उसके पते के बीच लगभग 10 किलोमीटर की दूरी थी। ऐसे में केवल छह मिनट के भीतर पार्सल का पहुंच जाना और डिलीवर हो जाना संदेह पैदा करता है।
आयोग ने भी माना कि ट्रैकिंग रिकॉर्ड में दिखाई गई समय-सारिणी कई सवाल खड़े करती है और कंपनी इन विसंगतियों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी।
अमेजन ने क्या कहा
अमेजन ने अपने बचाव में कहा कि वह केवल एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और “इंटरमीडियरी” है। कंपनी ने दलील दी कि वस्तु की बिक्री एक स्वतंत्र विक्रेता (Seller) द्वारा की गई थी और उसके तथा शिकायतकर्ता के बीच ही वास्तविक खरीद-बिक्री का अनुबंध था।
कंपनी ने यह भी कहा कि उत्पाद को सही हालत में शिकायतकर्ता के पते पर पहुंचा दिया गया था और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं।
इसके अलावा अमेजन ने यह तर्क भी दिया कि संबंधित विक्रेता को पक्षकार नहीं बनाया गया है, इसलिए शिकायत में आवश्यक पक्षकार की कमी है।
आयोग ने खारिज की दलील
उपभोक्ता आयोग ने अमेजन की इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि वह केवल एक मध्यस्थ है और उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।
आयोग ने कहा कि उपभोक्ता ने अमेजन के प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑर्डर किया, भुगतान Amazon Retail India की व्यवस्था के जरिए किया और शिकायत भी सीधे अमेजन के ग्राहक सेवा विभाग को भेजी। ऐसे में कंपनी स्वयं को पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकती।
फैसले में कहा गया कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म केवल अनुबंध की शर्तों या ‘इंटरमीडियरी’ होने का हवाला देकर उपभोक्ताओं के अधिकारों से बच नहीं सकते।
डिलीवरी का कोई ठोस प्रमाण नहीं
आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा बार-बार मांग किए जाने के बावजूद अमेजन यह साबित नहीं कर सका कि उत्पाद वास्तव में किस व्यक्ति को और किस प्रकार सौंपा गया था।
न तो कोई हस्ताक्षरित डिलीवरी रसीद पेश की गई और न ही ऐसा कोई दस्तावेज जिससे यह साबित हो सके कि उत्पाद शिकायतकर्ता तक पहुंचा था।
आयोग ने कहा कि यदि कोई कंपनी डिलीवरी का दावा करती है तो उसके पास इसका ठोस और विश्वसनीय प्रमाण होना चाहिए। इस मामले में कंपनी ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं कर सकी।
सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता ने सफलतापूर्वक साबित कर दिया है कि उसे ऑर्डर किया गया उत्पाद प्राप्त नहीं हुआ। इसके बावजूद कंपनी ने न तो राशि लौटाई और न ही संतोषजनक जांच की।
आयोग के अनुसार यह आचरण सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का स्पष्ट उदाहरण है। इससे उपभोक्ता को आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक तनाव और उत्पीड़न भी झेलना पड़ा।
क्या आदेश दिए गए
उपभोक्ता आयोग ने शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए Amazon Retail India प्राइवेट लिमिटेड को निम्न आदेश दिए—
– शिकायतकर्ता को 2,590 रुपये की पूरी राशि वापस की जाए।
– मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 10,000 रुपये का मुआवजा दिया जाए।
– आदेश की प्रति प्राप्त होने के 45 दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए अहम संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ऑनलाइन खरीदारी करने वाले लाखों उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि ई-कॉमर्स कंपनियां केवल प्लेटफॉर्म होने का दावा करके अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकतीं।
यदि किसी उपभोक्ता को सामान नहीं मिलता है और कंपनी डिलीवरी का विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाती, तो उसे उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह फैसला ऑनलाइन खरीदारी में पारदर्शिता और उपभोक्ता अधिकारों को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

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