Buland Kesari/ जालंधर में प्रवासी आबादी के बढ़ते दबाव और सरकारी दस्तावेज़ों के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि बाहरी राज्यों से आए प्रवासी लोग छोटे-छोटे मोहल्लों में किराए पर मकान लेकर बेहद आसानी से पंजाब के पते पर आधार कार्ड और नीले राशन कार्ड बनवा रहे हैं, जबकि स्थानीय पंजाबियों को इन्हीं दस्तावेज़ों के लिए महीनों दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आ रही है कि कई प्रवासियों के पास पहले से यूपी और बिहार के आधार कार्ड मौजूद हैं, बावजूद इसके वे पंजाब आकर नया आधार और राशन कार्ड बनवा लेते हैं। इससे उन्हें केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं का दोगुना लाभ मिल रहा है और सीधा नुकसान पंजाब के मूल निवासियों को हो रहा है।
पता बदलो, फायदा उठाओ
जानकारी के मुताबिक कुछ प्रवासी कुछ महीनों तक एक मकान में रहकर अपना पता बदलवा लेते हैं और बाद में वह मकान छोड़ देते हैं, लेकिन आधार कार्ड और नीले कार्ड का पूरा लाभ लेते रहते हैं। वहीं दूसरी ओर, वास्तविक पंजाबियों के न तो आसानी से आधार कार्ड बन पा रहे हैं और न ही उन्हें नीले कार्ड की सुविधा मिल पा रही है।
समाजसेवी सुखविंदर सिंह लक्की ने उठाई आवाज
इस पूरे मामले को लेकर समाजसेवी सुखविंदर सिंह लक्की ने आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार और जिला प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि पंजाबियों के अधिकारों पर सीधा हमला है।
लक्की ने मांग की है कि
पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच करवाई जाए।
जिन लोगों ने गलत तरीके से दोहरे आधार कार्ड और नीले कार्ड बनवाए हैं, उनके कार्ड तुरंत रद्द किए जाएं।
आधार और राशन कार्ड केवल स्थायी पते और सख्त सत्यापन के बाद ही बनाए जाएं।
पंजाबियों को उनके स्थायी पते के आधार पर प्राथमिकता दी जाए।
AAP सरकार पर गंभीर आरोप
इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी की सरकार पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आरोप है कि मौजूदा सरकार में जहां पंजाबियों की समस्याएं बढ़ रही हैं, वहीं प्रवासियों के लिए सरकारी प्रक्रियाएं दिन-प्रतिदिन आसान होती जा रही हैं। इससे न केवल सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग हो रहा है, बल्कि सामाजिक असंतोष भी तेजी से बढ़ रहा है।
प्रशासन की चुप्पी
अब तक जिला प्रशासन की ओर से इस पूरे मामले पर कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है। लेकिन बढ़ते रोष को देखते हुए यह साफ है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक और सामाजिक रूप ले सकता है।
अब सवाल यह है — क्या पंजाब सरकार पंजाबियों के हक की रक्षा करेगी या यह लापरवाही यूं ही चलती रहेगी?

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