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न्यायिक सेवा में 45% शर्त — आरक्षण की भावना पर आघात

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भारत के इस राज्य के CM और डिप्टी CM पर चलीं गोलियां!

Buland Kesari/ जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में स्थित...

Buland kesari/पंजाब कहने को तो बाबा नानक की धरती हैं लेकिन जहाँ के लोगों में ना धर्म का और ना सविधान का डर है और वो मनमाने फ़ैसले लेते रहते हैं।

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भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्री एस. आर. लधर ने न्यायिक सेवाओं में अनुसूचित जाति (SC) उम्मीदवारों के लिए 45% न्यूनतम अंकों की शर्त पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हालात यह हैं कि पंजाब में 39 आरक्षित पदों के विरुद्ध केवल 9 उम्मीदवारों का चयन हुआ, जबकि 30 पद या तो खाली रह गए या सामान्य वर्ग से भरे गए। यह स्थिति Constitution of India की मूल भावना और आरक्षण व्यवस्था के उद्देश्य के प्रतिकूल है।सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया के हाई कोर्ट चाहे तो ईस शरत को नरम कर सकती है? देखना यह है के कोर्ट्स लॉ मेकिंग बॉडी है याँ लॉ इम्प्लीमेंटिंग बॉडी ? शर्तें लगाना सरकार का काम हैं अदालत का नहीं। श्री लधर ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य केवल पद आरक्षित करना नहीं, बल्कि वंचित वर्गों को वास्तविक प्रतिनिधित्व देना है। यदि कठोर कट-ऑफ के कारण योग्य उम्मीदवारों को बाहर किया जाता है, तो यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत को कमजोर करता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब एक

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उम्मीदवार पहले ही विधि स्नातक (Law Graduate) की योग्यता प्राप्त कर चुका है, तो फिर अतिरिक्त न्यूनतम अंकों की शर्त लगाने का क्या औचित्य है? उन्होंने कहा कि ऐसी कोई शर्त न तो Union Public Service Commission की परीक्षाओं में लागू है और न ही संविधान में इसका कोई प्रावधान है। श्री लधर ने कहा कि यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस प्रकार की शर्तें न्यायपालिका द्वारा लगाई जा रही हैं, जिसे समाज “न्याय का मंदिर” मानता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका से अपेक्षा होती है कि वह सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करे, न कि ऐसे प्रावधान लागू करे जो वंचित वर्गों के अवसरों को सीमित करें। उन्होंने Supreme Court of India द्वारा इस मुद्दे पर पुनर्विचार के संकेत को सकारात्मक बताते हुए Punjab and Haryana High Court से आग्रह किया कि वह इस शर्त को समाप्त या व्यावहारिक रूप से शिथिल करे, ताकि आरक्षित वर्गों को न्यायिक सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। अंत में श्री लधर ने कहा कि सामाजिक न्याय केवल नीतियों से नहीं, बल्कि उनके संवेदनशील और व्यावहारिक क्रियान्वयन से सुनिश्चित होता है। श्री लधर ने कहा के पंजाब में बेसिक क्वालिफिकेशन लेने के बाद जुडिसियल सर्विस में एंट्री को शर्तें लगा कर रोकना दुर्भाग्य पूरण हैं और जातिवादी मानसिकता का परिचायक माना जाएगा क्योंकि देश के संविधान के ऊपर कुश भी नहीं है। देश की हाई कोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में इसी मानसिकता के कारण वंचित गरीब और उपेक्षित अनुसूचित जाती वर्गों को देश की एक तिहाई पॉपुलेशन होने के बावजूद 2% से कम प्रतिनिधत्व हासिल है। पंजाब में आज तक पार्लियामेंट में पारित संविधानिक 85th अमेंडमेंट लागू नहीं हुई। खेतीबाड़ी विश्वविद्यालय लुधियाना और गड़वासू विश्वविद्यालय लुधियाना में आरक्षण जीरो है। चनी जैसे नेता जो ख़ुद सी एम रह चुके है नयाय दिलाने में नाकाम रहे हैं बल्के पार्लियामेंट में आवाज तक नहीं उठाते। देश का सब से अधिक अनुसूचित जाती वाला प्रांत पंजाब (35%)आरक्षण के विषे पर सब से अधिक अपेक्षा का शिकार है। केंद्र की भाजपा सरकार को चाहिए के इस द्वेषपूर्ण नीति को पार्लियामेंट में एक्ट पारित करके सविधान की मूल भावना को लागू करने का आदेश दें।

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Disclaimer:Buland Kesari receives the above news from social media. We do not officially confirm any news. If anyone has an objection to any news or wants to put his side in any news, then he can contact us on +91-98880-00404.

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