जालंधर/Buland Kesari/जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जालंधर ने एक अहम फैसले में HDFC बैंक की लापरवाही को सेवा में कमी मानते हुए ग्राहक के पक्ष में निर्णय सुनाया है। आयोग ने Hdfc बैंक को आदेश दिया है कि यदि भविष्य में संबंधित बाउंस चेक और डिसऑनर मेमो मिलते हैं तो उन्हें शिकायतकर्ता को सौंपा जाए। साथ ही मानसिक तनाव और उत्पीड़न के लिए 15 हजार रुपये तथा मुकदमेबाजी खर्च के रूप में 8 हजार रुपये अदा किए जाएं।
यह फैसला आयोग की अध्यक्ष डॉ. हरवीन भारद्वाज, सदस्य जसवंत सिंह ढिल्लों और ज्योत्सना की बेंच ने 17 अप्रैल 2026 को सुनाया।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने 10 अक्टूबर 2024 को अपने बैंक खाते में एक चेक जमा करवाया था, जो “फंड्स इंसफिशिएंट” होने के कारण बाउंस हो गया। बैंक ने ग्राहक को सिर्फ एक मैसेज भेजकर चेक डिसऑनर होने की जानकारी दी, लेकिन बाउंस चेक और डिसऑनर मेमो उपलब्ध नहीं करवाया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसने कई बार मौखिक अनुरोध किए और बाद में 30 अक्टूबर 2024 को कानूनी नोटिस भी भेजा, लेकिन इसके बावजूद बैंक ने जरूरी दस्तावेज नहीं दिए।
शिकायतकर्ता ने आयोग को बताया कि बाउंस चेक और मेमो न मिलने के कारण वह नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं कर सका। इससे उसे मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और कानूनी अधिकारों से वंचित होना पड़ा।
वहीं बैंक ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि चेक और मेमो कूरियर के माध्यम से भेज दिए गए थे और उन्होंने आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की थी। बैंक ने यह भी दलील दी कि यदि कोई चूक हुई है तो उसमें कूरियर कंपनी की भूमिका है, इसलिए शिकायत गैर-जरूरी पक्षों को शामिल किए बिना दायर की गई है।
हालांकि आयोग ने बैंक की दलीलों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। आयोग ने कहा कि बैंक कोई ऐसा रिकॉर्ड, कूरियर रसीद या ट्रैकिंग रिपोर्ट पेश नहीं कर पाया जिससे यह साबित हो सके कि चेक और डिसऑनर मेमो वास्तव में शिकायतकर्ता तक पहुंचे थे। आयोग ने माना कि संबंधित दस्तावेज शिकायतकर्ता के लिए बेहद जरूरी थे ताकि वह चेक बाउंस मामले में कानूनी कार्रवाई कर सके।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बैंक की ओर से दस्तावेज उपलब्ध न करवाना स्पष्ट रूप से “सेवा में कमी” की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर आयोग ने शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बैंक को शिकायतकर्ता को 15 हजार रुपये मुआवजा और 8 हजार रुपये मुकदमे का खर्च देने के निर्देश दिए।
आयोग ने आदेश में कहा कि फैसला मिलने के 45 दिनों के भीतर संपूर्ण अनुपालन किया जाए। आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि कार्यभार अधिक होने के कारण मामले का निपटारा निर्धारित समय सीमा में नहीं हो सका।

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