Buland kesari/लुधियाना पुलिस ने इंटरनेशनल साइबर फ्रॉड नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने 132 ठगों को गिरफ्तार किया है। इस गिरोह के सदस्य विदेशी लोगों को अपना शिकार बनाते थे। इस कॉल सेंटर के बारे पुलिस को गुप्त सूचना थी। जिसके बाद ही पुलिस ने रेड कर इन आरोपियों को पकड़ा है। मास्टरमाइंड दिल्ली, गुजरात के रहने वाले हैं।
आरोपियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए तकनीकी सेवा प्रोवाइडर के रूप में खुद को पेश करते थे। इन्होंने विदेशियों को पैसों के लिए धोखा दिया है। इसमें इस्तेमाल किए गए सभी मोबाइल भी पुलिस ने जब्त कर लिए है। गिरफ्तार किए गिरोह के सदस्य देश के अलग-अलग राज्यों से संबंधित है। इस गैंग के मास्टरमाइंड का आज खुलासा पुलिस कमिश्नर स्वपन शर्मा प्रेसवार्ता में किया।

नकदी, मोबाइल, हाई-टेक लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद पुलिस कमिश्नर स्वपन शर्मा ने कहा कि 132 आरोपियों के खिलाफ पुलिस टीम ने एफआईआर नंबर 37 दिनांक 13 मई 2026 के तहत थाना साइबर क्राइम में BNS की धाराओं 318(4), 319(2), 336(3), 61(2) और IT एक्ट की धाराओं 66-C, 66-D, 75 के तहत मामला दर्ज किया है।
पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि शहर में कुछ कॉल सेंटर विदेशी नागरिकों को ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार बना रहे हैं। इसके बाद पुलिस ने संधू टॉवर और सिल्वर ओक के पास स्थित कई कमर्शियल परिसरों में एक साथ छापेमारी की।
रेड में क्या-क्या हुआ बरामद पुलिस टीम को रेड दौरान करीब 1 करोड़ 7 लाख रुपए की भारतीय नकदी, 98 लैपटॉप, 229 मोबाइल फोन, 19 लग्जरी कारें, 300 से ज्यादा बैंक खाते फ्रीज किए। इसके अलावा इनकम टैक्स विभाग को भी जांच में शामिल कर लिया गया है।

ऐसे करते थे विदेशी नागरिकों से ठगी CP शर्मा के मुताबिक जांच में सामने आया कि आरोपी विदेशी लोगों के कंप्यूटर स्क्रीन पर Microsoft कंपनी के नाम से फर्जी वायरस और सिक्योरिटी अलर्ट भेजते थे। स्क्रीन पर एक फेक कस्टमर केयर नंबर भी दिखाया जाता था। जैसे ही पीड़ित उस नंबर पर कॉल करता, कॉल X-Lite Software के जरिए सीधे ठगों तक पहुंच जाती।
UltraViewer से रिमोट पर लेते थे स्क्रीन इसके बाद आरोपी खुद को टेक्निकल सपोर्ट कर्मचारी बताकर पीड़ित को UltraViewer जैसे Remote Access Software डाउनलोड करवाते थे। इसके जरिए आरोपी पीड़ित के कंप्यूटर का पूरा एक्सेस हासिल कर लेते थे। बाद में नकली स्कैन और फर्जी पॉप-अप दिखाकर बैंक अकाउंट, ईमेल हैक होने या चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसे झूठे आरोप लगाकर डराया जाता था।
“ओपनर” और “क्लोजर” की टीम बनाकर करते थे फ्रॉड CP स्वपन शर्मा ने कहा कि हर कॉल सेंटर में 8 से 10 टीमें बनाई गई थीं और हर टीम में 6 से 7 सदस्य काम करते थे। “ओपनर” पीड़ित को झांसे में लेकर सिस्टम एक्सेस लेते थे। “क्लोजर” खुद को बैंक अधिकारी बताकर पैसे ट्रांसफर करवाते थे।
पीड़ितों से इन तरीकों से करते थे ठगी आरोपी घर से कैश पिकअप, सोना खरीदवाकर डोरस्टेप से उठवाना, Amazon और Apple Gift Cards खरीदवाना, फर्जी विदेशी खातों में वायर ट्रांसफर, हवाला और क्रिप्टो के जरिए भारत पहुंचता था। पुलिस जांच में सामने आया कि ठगी की रकम हवाला नेटवर्क, क्रिप्टोकरेंसी और अन्य अवैध चैनलों के जरिए भारत लाई जाती थी।
प्रारंभिक जांच में पता चला है कि हर ऑपरेटर रोजाना औसतन 8 से 10 कॉल संभालता था। कर्मचारियों को फिक्स सैलरी के साथ इंसेंटिव भी दिया जाता था। फिलहाल पुलिस डिजिटल एविडेंस, हवाला लिंक, क्रिप्टो ट्रांजैक्शन, प्रॉपर्टी मालिकों और अन्य सहयोगियों की भूमिका की जांच कर रही है। पुलिस कमिश्नरेट शर्मा ने कहा कि साइबर अपराधियों और संगठित फ्रॉड नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।
किराए पर जगह ले बनाया सेंटर पुलिस ने जब रेड की तो कई युवक और युवतियों को वहां से पकड़ा। सूत्रों के मुताबिक पता चला है कि मास्टमाइंड गरीब परिवारों से संबंध रखने वाले लड़के-लड़कियों को जल्द अमीर बनने के सपने दिखा इस काम में लगाया है।

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