Buland kesari/पंजाब में शिरोमणि अकाली दल पुनर सुरजीत के नेता मनप्रीत अयाली ने अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसका ऐलान उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर अपना वीडियो व पोस्ट डालकर दी है।हालांकि उन्होंने मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि चाहे कितना भी दबाव हो, हम दिल्ली से चलने वाली पार्टियों-चाहे बीजेपी हो, आम आदमी पार्टी हो, कांग्रेस हो या बादल दल हो – उनमें जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सिख बुद्धिजीवियों और समूचे पंथ की भावनाओं के अनुसार जो भी फैसला होगा, हम पंथ की चढ़दी कला के लिए काम करेंगे। गुरु साहिब हमें सुमति दें कि हम निस्वार्थ भाव से पंथ और पंजाब की सेवा कर सकें। सारी संगत का धन्यवाद।
मनप्रीत अयाली ने पार्टी छोड़ने की यह 6 वजह बताई है –
1. भर्ती शुरू करने की डयूटी लगाई
“सबसे पहले सबको फतेह बुलाता हूं- वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह। आज मैं आपके रूबरू ‘पुनर सुरजीत शिरोमणि अकाली दल’ के संबंध में हुआ हूं। 2 दिसंबर, 2024 को श्री अकाल तख्त साहिब से एक हुकमनामा जारी हुआ था उसकी कॉपी मेरे हाथ में है।
उस हुकमनामे में जत्थेदार साहिबान द्वारा यह कहा गया कि शिरोमणि अकाली दल की लीडरशिप अपने इन गुनाहों के कारण सिख कौम का राजनीतिक नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। इसलिए पांच सिंह साहिबान द्वारा नेताओं की ड्यूटी लगाई जाती है कि वह शिरोमणि अकाली दल की भर्ती शुरू करें।
2.सुखबीर बादल ने कमेटी को मानने से इ्कार किया
भर्ती बोगस (फर्जी) न हो, आधार कार्ड की कॉपी के साथ सदस्य बनाया जाए। पुराने डेलिगेट्स के साथ-साथ नए डेलिगेट बनाकर 6 महीने के अंदर प्रधान और अन्य पदाधिकारियों का चुनाव विधान के मुताबिक करें। इस कमेटी में नीचे लिखे अनुसार सदस्य शामिल किए जाते हैं, जिसमें दास (मुझे) भी शामिल किया गया। सात मेंबर बनाए गए थे, जिनमें से दो ने इस्तीफा दे दिया और पांच मेंबर रह गए। यह भर्ती शिरोमणि अकाली दल की होनी थी, लेकिन सुखबीर सिंह बादल द्वारा इस कमेटी को मानने से इन्कार कर दिया गया।
3. सिंह साहिबान ने भर्ती जारी रखने को कहा
उसके बाद जत्थेदार श्री अकाल तख्त साहिब ज्ञानी रघबीर सिंह जी द्वारा हमें आदेश जारी किया गया कि आप भर्ती करें। हमने पूरी निष्ठा, पूरी ईमानदारी और तन-मन-धन के साथ, बिना किसी पद के लालच के, निष्काम भाव से यह भर्ती की। जब हम भर्ती कर रहे थे, उस समय के दौरान सिख संगत और नौजवानों की तरफ से हमारे ध्यान में यह बात आई कि आपकी स्टेजों पर वही लोग हैं जो श्री अकाल तख्त साहिब की फसील के सामने खड़े थे और जो नैतिक अधिकार खो चुके हैं।
हालांकि वे बहुत सम्माननीय हैं और हमारा किसी से कोई निजी मसला नहीं है, लेकिन ये बातें हमारे पास आईं और हमने भर्ती के दौरान भी ये बातें रखीं। लेकिन उन नेता साहिबान द्वारा हमें यह कहा गया कि भर्ती कमेटी का काम सिर्फ भर्ती करना है।
4. हमारा चरित्र हनन तक किया गया
हमने सोचा कि अकाल तख्त साहिब ने हमारी ड्यूटी लगाई है, तो इसे पूरा करें। इसमें बहुत चुनौतियां थीं, हमारी ‘किरदारकशी’ (चरित्र हनन) की गई, लेकिन हमारा मकसद सिर्फ अकाल तख्त साहिब का हुकमनामा मानना था। अकाली दल के नेताओं और उनके आईटी विंग द्वारा हमारी बहुत किरदारकशी की गई।
हमने यह भर्ती करके डेलिगेट चुने और आगे डेलिगेट्स ने अपना प्रधान चुन लिया, जिससे हमारी ड्यूटी पूरी हो गई। हम पांचों में से किसी ने यह नहीं कहा कि मुझे प्रधान बनना है या कोई पद लेना है, किसी की कोई लालच नहीं थी। हालांकि हम पर इस बात का बहुत दबाव था कि आप प्रधान बनें, लेकिन हमने कहा कि हमारी ड्यूटी सिर्फ भर्ती करने की है।
जिस दिन भर्ती हुई और प्रधान चुने गए, उसी दिन मैंने इच्छा जाहिर की थी कि हमारी ड्यूटी खत्म हो गई है और मैं अब इजाजत चाहता हूं। लेकिन उन्होंने कहा कि अभी यह शुरुआत है और नुकसान होगा, तो मैं चुप कर गया। उसके बाद एक-दो मीटिंगों में हमने फिर वही बात रखी कि संगत की भावना है कि जो लीडरशिप नैतिक अधिकार खो चुकी है, वह कम से कम एक साल के लिए पीछे हट जाए और बाद में आगे आ जाए, तो आपका यह पुनर्गठन कामयाब होगा और संगत का सहयोग मिलेगा।
परंतु वे पीछे नहीं हटे और उन्होंने हमें फिर से यही कहा कि आपका काम सिर्फ भर्ती तक था और वह खत्म हो गया है। नतीजा यह हुआ कि जब वे पीछे नहीं हटे, तो संगत उनसे पीछे हट गई। वर्कर और कुछ नेता भी पीछे हटने शुरू हो गए। मैंने कोशिश जारी रखी, मीटिंगों में सुझाव दिए, लेकिन हम जो फैसला करके आते थे, अगले दिन अखबार में उसके बिल्कुल उलट खबर लगती थी।
5. हमने सभी एकजुट करने की कोशिश की
पहले दिन से मेरी कोशिश रही कि अकाल तख्त साहिब के हुकमनामे के अनुसार सभी पंथक पक्षों को इकट्ठा किया जाए, न कि अलग चूल्हे जलाए जाएं। इसके लिए हमने बहुत कोशिश की। उसी समय ‘वारिस पंजाब दे’ जत्थेबंदी भी अस्तित्व में आई, जिसमें भाई अमृतपाल सिंह नौजवानों को नशे से हटाकर गुरु के लड़ लगा रहे थे। हमारी कोशिश थी कि सबको इकट्ठा किया जाए।
7-8 महीने की कोशिश के बाद एक तालमेल कमेटी बनी, जिसकी दो-तीन मीटिंगें हुईं। वहां फिर वही बात आई कि जब ‘वारिस पंजाब दे’ ने सिख संगत और नौजवानों से राय ली, तो उन्होंने भी यही कहा कि पुरानी लीडरशिप को कुछ समय के लिए पीछे किया जाए। लेकिन उन्होंने (पुरानी लीडरशिप ने) मानने से इनकार कर दिया और कहा कि हम तो सजा भुगत चुके हैं।
हमारा किसी से निजी झगड़ा नहीं है, हम तो पंथ की भावनाओं की बात कर रहे हैं। अगर हम पंथ की भावनाओं के अनुसार फैसले लेंगे, तभी लोग हमारे साथ खड़े होंगे। यही कारण रहा कि वह तालमेल भी टूट गया।
6. इस वजह से पार्टी छोड़ने का फैसला लिया
जब कोई बात मानने को तैयार ही नहीं है, तो इसी वजह से आज मैंने यह फैसला लिया है कि मैं ‘पुनरसुरजीत शिरोमणि अकाली दल’ के सभी पदों से इस्तीफा दे रहा हूं। मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि चाहे कितना भी दबाव हो, हम दिल्ली से चलने वाली पार्टियों – चाहे बीजेपी हो, आम आदमी पार्टी हो, कांग्रेस हो या बादल दल हो – उनमें जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
आने वाले समय में सिख बुद्धिजीवियों और समूचे पंथ की भावनाओं के अनुसार जो भी फैसला होगा, हम पंथ की चढ़दी कला के लिए काम करेंगे। गुरु साहिब हमें सुमति दें कि हम निस्वार्थ भाव से पंथ और पंजाब की सेवा कर सकें। सारी संगत का धन्यवाद। वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

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